रेटिंग - ५/२.५
दो टूक : मामला रिश्तों का हो या पैसों का. आपके अन्दर का इंसान कभी नहीं बदलता. बस यही छोटा सा सन्देश देती है निर्देशक सुपवित्र बाबुल की पुलकित सम्राट, अमिता पाठक, राजेन्द्र सेठी और मोहन कपूर के अभिनय वाली फिल्म बिट्टू बॉस.
कहानी : फिल्म की कहानी पंजाब के आनंद पुर साहेब में रहने वाले बिट्टू [पुलकित सम्राट] की है. बिट्टू शादियों में वीडियो शूटिंग करता है और लोगों के चेहरों पर खुशियों को कैमरे में कैद करना उसका पेशा है. लोग उसकी अहमियत तब तक ही मानते हैं जब तक वो कैमरा लेकर उनके सामने है. लोग उसे टुचा कैमरामैन कहते हैं. मस्त बिट्टू इसकी परवाह नहीं करता. पर एक शादी में मृणालिनी [अमिता पाठक] से उसकी मुलाक़ात सबकुछ बदल देती है. वो चाहती है बिट्टू कोई बड़ा काम करे . वो उसे लोकल टीवी स्टेशन ले जाती है पर जब उसे वहां से अपमानित कर निकाल दिया जाता है तो वो पैसा और नाम कमाने की जुगत में लग जाता है ताकि खुद को साबित कर सके. एक दिन उसका एडिटर वर्मा (राजिंदर सेठी) उसे एक ब्लू फिल्म के जरिये पैसा कमाने का आयडिया देता है. वह ब्लू फिल्म बनाने के लिए शिमला पहुंच जाता है और एक होटल में रूककर दूसरे कमरों में हिडन कैमरे भी लगा देता है ताकि कमरे में होने वाली गतिविधियों को रिकॉर्ड कर मार्केट में बेचे और खूब पैसा कमाए. पर उसका जमीर उसे इस बात की इजाजत नहीं देता. यहीं नहीं,अपने कैमरे में जब उसे एक कमरे में एक लड़की मुसबत में नजर आती है तो फिर उसकी उसे बचाने की मुहीम शुरू हो जाती है. बस एक इंसान के सच और उसके सामने आने की रोचक कहानी है बिट्टू बॉस .
गीत संगीत : फिल्म में कुमार के लिखे गीत और संगीत राजीव सच्चर का है. अब फिल्म चूँकि शादी ब्याह से जुडी कहानी के बीच सफर करती है तो इसका गीत संगीत भी वैसा ही गढ़ा गया है . खासतौर से बिट्टू सब की लेगा जैसे गीत. फिल्म का फ्लेवर पंजाबी है और उसका संगीत भी उसी छुअन के साथ रचा गया है . मिका फिल्म के गीतों में पूरी मस्ती और जोश में दीखते हैं इसलिए उनका कबूतर, श्रेया का कौन केन्दा, तुलसी कुमार का लठ्ठे दी चादर जैसे गीत सुने जा सकते हैं.
अभिनय : टीवी धारावाहिकों के बाद पुलकित सम्राट ने अपनी पहली ही फिल्म में आत्मविश्वास का परिचय दिया है. बिट्टू की भूमिका के लिए पुलकित सटीक चुनाव है. उनकी शारीरिक भाषा के हिसाब से भी और भाव-भंगिमाओं में शामिल लुक में भी. सपनों से भरे एक कस्बाई युवक की भूमिका उनपर फब गयी है. अमिता पाठक को मौका मिला है खुद को साबित करने का पर वे पुलकित के सामने बहुत जयादा जोर आज्मायश नहीं कर पाई है.विक्की ड्रायवर बने आशुतोष पाठक, टीवी एडिटर बने राजेंदर सेठी याद रहते हैं पर मोहन कपूर को कुछ और विस्तार दिया जा सकता था. हालांकि फिल्म में बहुत सारे छोटे छोटे पात्र और चरित्र हैं पर वे याद रहते हैं उनके नाम नहीं.
निर्देशन : गौर से देखा जाए तो यशराज चोपड़ा शैली की फिल्मों की तरह बनी बिट्टू बॉस के लिए निर्देशक के पास एक अच्छा विचार था. लेकिन मध्यांतर से पहले एक शानदार फिल्म का आभास देती यह फिल्म मध्यांतर के बाद गति धीमी के कारण बहुत जयादा रोचकता नहीं जगा पाती. उदंड किस्म के कस्बाई या गंवई सपनों से लदे युवकों पर हमारे यहाँ बेहतर फ़िल्में बनी हैं. बिट्टू बॉस भी इसी कड़ी में शामिल है और उनके लिए एक सन्देश की तरह सामने आती है. पर इसमें बैंड बाजा बारात और तनु वेड्स मनु की छायाएं बनी रहती हैं. फिर भी अगर इसमें नयी बात दिखती है तो इसकी वजह है कि ये कुछ भावनातमक पलों को अलग तेवर के साथ दिखाती है . यह अलग बात है कि शिमला की सुंदर लोकेशन पर बनी, गौतम मेहरा के संवाद, अभिषेक सेठ के सम्पादन और मनीष भट्ट के कैमरा वर्क वाली फिल्म कुछ और बेहतर बन सकती थी.
फिल्म क्यों देखें : अच्छी फिल्म है.
फिल्म क्यों ना देखें : अगर बैंड बाजा बरात जैसी फिल्म देख चुके हों.
(रामकिशोर पारचा जाने-माने फिल्म समीक्षक है और काफी लम्बे समय से
जर्नलिस्ट टुडे से जुडे है।)