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Film Reviews

Creativity knows no bounds proves Ayaan Ali Khan

Naresh_Kapuria_Alexandra_Tomasikova_Shovana_Narayan_Jyotsna_Suri_Subhalakshmi_KhanNew Delhi, April 26, 2012:  Renowned sarod player Ayaan Ali Khan extends his creativity this season as his art exhibition opened yesterday at the Art Junction Gallery of The Lalit Hotel, New Delhi.The exhibition comprises of skilfully designed 40 artworks of acrylic and water colours based on Ragas and is a beautiful combination of Lord Ganesha and the musical instrument sarod.Talking about his second passion, Ayaan said, “I have had an obsession with paining and sketching right from my childhood. In fact, I was always very good in diagrams in school and eventually had art as a subject too. It was gods, cartoon characters, musicians, still life; everything under the sun!”

 “I guess I was self taught however, my subject or fascination has always been Ganeshas. Nothing in particular led me to get into art but I guess it was just an extension of my creativity.”Curator of Art Junction and eminent artist Naresh kapuria said, “Ayaan Ali Khan is synonym with talent and passion, his artwork displayed in the gallery today is celebration of colours and ragas. The artist has chosen a very beautiful subject for the exhibition, which is none other than Lord Ganesha. Ayaan is a renowned Sarod player but after witnessing the skilled artwork, I can say that he will very soon become a prominent painter.”The exhibition which will remain on display till May 10, 2012, opened amidst guests like Dr.Jyotsna Suri, Abida Parveen, Subhalakshmi Khan, Deepak Mishra, BP Singh, Sharon Lowem, Shovana Narayan, Herbert Traxl, JJ Valaya, among others.

 

विक्की डोनर [सोशल कामेडी ड्रामा ]

img1120404168_1_1दो टूक : जिन्दगी में कई बार ऐसा समय आता है जब हम किसी के सपनों के पूरे होने की वजह बनते हैं पर खुद अपने ही सपनों को उन्ही वजहों से टूटता और बिखरता देखते हैं. पर ये भी याद रखना जरुरी है कि किसी भी बिखराव के बाद संभावनाएं कभी ख़तम नहीं होती. बस आपको उनमे से चुन लेना होता है कि आप उनके सहारे फिर से कैसे खुद को चलना सिखा सकते हैं. ताकि जिन्दगी चलती रहे. कुछ ऐसे ही नयी संभावनाओं और शुरुआतों की कहानी कहती है निर्देशक शुजीत सरकार की आयुष्मान खुराना, यामी गौतम, अन्नू कपूर, डौली आहलुवालिया , कमलेश गिल और जयंत दास के अभिनय वाली फिल्म विक्की डोनर.

कहानी : फिल्म की कहानी फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉ. बलदेव चड्ढा[अन्नू कपूर] से जुड़े मस्त किस्म के नायक विकी [आयुष्मान खुराना ] की है. चड्ढा स्पर्म डूनेशन यानी वीर्यदान बैंक नाम का क्लिनिक चलाता है .विक्की ब्यूटी पार्लर चलाने वाली अपनी विधवामाँ डॉली [डौली आहलुवालिया ] और दादी [कमलेश गिल ] के साथ रहता है. पर विक्की और चड्ढा की मुलाकात उन दोनों की राह और जिन्दगी बदल देती है . अपने आर्थिक हालत सुधारने के लिए ना चाहते हुए भी विक्की स्पर्म डोनर बन जाता है. पर उसकी दिक्कतें तब शुरू होती हैं जब उसकी जिन्दगी में आशिमा रॉय[यमी गौतम] नामक एक खूबसूरत बंगाली लड़की आ जाती है. तमाम विरोधाभासों और संस्कृतियों के विपरीत होते हुए दोनों की शादी हो जाती है . लेकिन जब आशिमा को पता चलता है कि वो कभी माँ नहीं बन सकती और उधर विकी स्पर्म डोनर होने की बात छुपा लेता है तो उसका दिल टूट जाता है. विकी की सारी खुशियाँ बिखर जाती हैं . बिना बच्चों के माँ बापों  को बच्चों की खुशियाँ देने वाला विकी अपनी ही पत्नी को माँ बनने का सुख नहीं दे सकता. ऐसे में  मदद का आधार बनता हैचड्ढा. जो आशिमा को यकीन दिलाता है कि विकी ने दुनिया को क्या दिया है पर उसका ये काम उन्हें भी खुशियाँ दे सकता है.इसके बाद शुरू होती है दोनों को अपने रिश्ते और घर वापस लाने की तैयारी. बस कुछ ऐसे ही शुरुआतों और नयी संभावानाओं की कहानी है विकी डोनर.

गीत संगीत : विकी डोनर एक छोटे बजट की विषयक कॉमेडी फिल्महै और स्पर्म डोनेशन यानी वीर्यदान जैसे बोझिल विषय को लेकर अनूठे तरीके से रची गयी है. यही नहीं इसमें अभिनेता से लेकरगीतकार और संगीतकार तक नए  हैं.फिल्म में अक्षय वर्मा के गीत और संगीत अभिषेक-अक्षय का है.हालांकि पिछले  दिनों फिल्म कीज्यादा चर्चा उसके विषय को लेकर हुई है पर अगर आप इसका संगीत सुनेंगे तो आपको निराशा नहीं होगी. इसलिए इसके अदितिसिंह शर्मा और अक्षय वर्मा के गाए गीत रोकड़ा रम-रम-रम ,रमव्हिस्की, पानी दा रंग के साथ पीछे पै गया साडे चड्ढा जैसे गीत सुने जा सकते हैं और मीका के साथ विशाल ददलानी और सुनिधिचौहान का गाया गीत मर जाइयां भी सुना जा सकता है. फिर भी इसका लोकप्रिय गीत रम-रम-रम और पानी दा रंग ही है. पर मेरी पसंद सुनेंगे तो जूही चतुर्वेदी का लिखा और क्लिंटन सेर्जो के साथ आदिती सिंह शर्मा का गाया गीत खो जाने दो ही है.और आपको बता दूं कि फिल्म की लेखिका भी वही हैं.

अभिनय : फिल्म के केंद्र में आयुष्मान खुराना  हैं लेकिन उनके पात्र का आधार अन्नू कपूर हैं जिन्होंने डॉक्टर बलदेव चड्ढा के पात्र को जीवंत और प्राकृतिक बना दिया है. फिल्म की प्रष्ठभूमि चूंकि दिल्ली की लाजपत नगर का पंजाबी परिवेश हैं सो उनकी शारीरिक परिभाषा और संवाद अदायगी भी कमाल का आभास देता है. यही कुछ आयुष्मान के साथ भी है. सही मायनों में वही फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि भी हैं. उन्होंने पहले एक मस्ती में डूबे सपनों को पूरा करने वाले युवक और फिर नायिका के दुःख के विवरणों का विस्तार समझने वाले पति के रूप में संतुलित और प्रभावित करने वाली भूमिका की है. उनकी संवाद आदयगी सरल है और बनावट से दूर भी. यामी गौतम फिल्म की दूसरी अच्छी उपलब्धि हैं.वे सुंदर दिखी हैं और संवेदनशील भी.भावुक दृश्यों में उनकी अभिव्यक्तियाँ कमाल की हैं. फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जब वे अपनी सक्षम अभिनय प्रतिभा का परिचय देती हैं.अपनी आँखों और होंटो के इस्तेमाल के साथ वे अपने स्वर व्यंजनाओं में भी गभीर दिखी हैं. डौली आहलुवालिया का जवाब नहीं और कमलेश गिल उनके साथ जम गयी हैं पर संक्षिप्त भूमिका में यामी के पिता बने जयंत दास को भी याद रखा जा सकता है.

निर्देशन : गौर से देखा जाए तो स्पर्म डोनेशन जैसे संवेदनशील मुद्देऔर विषय को लेकर बनी विकी डोनर केवल एक फिल्म नहीं है बल्किपंजाबी और बंगाली संस्कृति को मिलाकर रची गयी ये फिल्म कई स्तरों वाली जिन्दगी और रिश्तों को दिखाने वाली कहानी भी है. इसमें मनोरंजन के साथ वीर्यदान जैसे अछूते सामाजिक विषय को आधार बनाया गया है और उसे पाश्र्व में रखकर महानगरीयभागदौड़ के बीच विज्ञान को मिलाकर एक शानदार प्रेम कहानी भी बुन दी गयी है. फिल्म कई मामलों में हमें छूती है और उद्वेलित भी करती है पर इसमें सबसे महत्वपूर्ण है एक सन्देश जिसके बारे में अभी लोग कम जानते हैं . बस उसे महानगरीय परिवेश से जोड़कर परदे पर रच दिया गया है. फिल्म मध्यांतर से पहले चुस्ती से एक हास्य फिल्म का आभास देती है पर जल्दी ही वह अपने विषय की संवेदनशीलता को छू लेती है. जो हम तक कई तरगों की तरह आती है और उसके संवाद हमें अपने अर्थों से जोड़ लेते हैं.हो सकता है कि कुछ लोग इसे मजे के लिए देखें पर मेरा मानना है कि इसके निर्माता जॉन अब्राहम और लेखिका जूही चतुर्वेदी को बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने एक बेरस विषय को फिल्म के कैनवास पर उकेरने का साहस किया. जहां उनके पात्र अपनी भाव-भंगिमाओं में बिना कोईबचकानी हरकत किये वीर्यदान संबंधी भ्रांतियों और पूर्वाग्रहों पर सरल तरीके से बात करते हैं और दो संस्कृतियों के दुराग्रहों के बीचप्रेम और समन्वय स्थापित करने के मुद्दे पर भी. पर इसके लिए निर्देशक शुजीत सरकार, लेखिका जूही चतुर्वेदी ,कैमरामैन कमलजीत नेगी और शेखर प्रजापति का सम्पादन भी बधाई के पात्र हैं.

फिल्म क्यों देखें : ऐसी फ़िल्में कम बनती हैं.

फिल्म क्यों ना देखें : ऐसी कोई वजह मेरे पास नहीं.

रेटिंग - /३.५

रामकिशोर पारचा

हेट स्टोरी [थ्रिलर सस्पेंस ]

hate11111111_hदो टूक : सपनों में उलझी महत्वकांक्षाओं को पूरा करना कोई बुरी बात नहीं पर उसके लिए खुद को उस गुंजल में फांसकर तबाह कर लेना भी अच्छी बात नहीं. यही नहीं, अगर ये सपने और महत्वकांक्षा धोखे और बदले की आग से नाता जोड़ लें तो फिर आखिर आप समझ ही नहीं पायेंगे कि इसके अंत में आपके लिए क्या तय हुआ है. बस इतनी सी बात कहती है निर्देशकविवेक अग्निहोत्री की गुलशन देवैया, पाउली दाम, निखिल दिवेदी ,मोहन कपूर, जॉय सेन गुप्ता और सौरभ दूबे के अभिनय वाली फिल्म हेट स्टोरी.

कहानी : फिल्म की कहानी नाम और पैसा कमाने की लालसा रखने वाली पत्रकार काव्या [पाउली दाम] नाम की ऐसी पत्रकार की है जो एक सीमेंट कंपनी के खिलाफ धोखाधड़ी व षड्यंत्र रचने कापर्दाफाश करती है और फिर उसी कम्पनी में पैसे के लिए काम करने लगती है. लेकिन कंपनी का मालिक सिद्धार्थ धनराजगिरी[गुलशन देवैया] जब उसे प्रेम के नाम पर शारीरिक और मानसिक तौर पर धोखा देकर ये बता देता है कि उसने तो सिर्फ उसके किये का बदला लिया है तो उसकी जिन्दगी और मकसद दोनों बदल जाते हैं.  वहसिद्धार्थ से बदला लेने और उसे पूरी तरह बर्बाद कर देने के लिए कमर कस लेती है. लेकिन ये रास्ता किसी आंदोलन से जुड़ा नहीं है बल्कि इसके लिए वह अपने शरीर का ही सहारा लेती है.वह शहर की जानी मानी कालगर्ल [भैरवी गोस्वामी ] से कालगर्ल बनकर सेक्स को प्रेम से अलग इस्तेमाल करने के तरीके सीखती है और  सबसे पहले वह कम्पनी के सी ओ राजदेव सिंह [जॉय सेन गुप्ता ] को अपने प्रेम जाल में फंसाती है और फिर सिद्दार्थ धनराज के पिता कुमार धनराज [ सौरब दूबे ] तक पहुँच जाती है. काव्या का दोस्त विकी [निखिल दिवेदी ] उसे रोकना चाहता है पर तब तक वह बदला लेने और नफरत के साथ जिन्दगी और रिश्तों से इतनी दूर पहुँच जाती है जहां से लौटना उसके बस की बात नहीं. पर नफरत के इस सफर में काव्या को नफरत और लालच से सने जिन चेहरों और सच का सामना करना पड़ता है ये उसी की कहानी है.जिसमे मोहन कपूर, राजेश कुमार और इरावती हर्षे के पात्र और चरित्र भी शामिल हैं.

गीत संगीत : विक्रम भट्ट की फ़िल्में चलें या न चले पर उनका गीत संगीत जरुर सुना और सराहा जाता है . फिल्म में कुमार के लिखे गीत हैं और संगीत हर्षित सक्सेना का है. पर मुझे इस फिल्म में वो बात नहीं नजर आती जो उनकी पिछली कुछ फिल्मों में रही है.फिर भी आप चाहें तो माहे जान, कृष्ण बेरा का गाया दिल कांच सा और सुनिधि का रात जैसे बोलों वाले गीत सुन सकते हैं.

अभिनय : अब चूँकि फिल्म नायिका प्रधान है तो पूरी फिल्म पाउलीके कंधों पर टिकी है.उन्होंने मेहनत की है कपडे उतारने में भी और अपनी सांवली काया के साथ अभिनय के नए प्रतीक और अवयव बुनने में भी.पर उनमे वो बात नहीं जो ऐंद्रिकता पैदा करे या अपनी अभिव्यक्तियों में प्रभाव पैदा करें.हाँ बोल्ड दृश्यों और संवादों में उन्होंने सचमुच साहस का परिचय दिया है. दम मारो दम और शैतान के बाद गुलशन देवैया इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकते हैं.सिद्दार्थ की नेगेटिव शेड की भूमिका और उसके संकेतों में वे नयी रीच वाले अभिनेता साबित हुए हैं.उनकी संवाद अदायगी अद्भुत उतार चढ़ाव वाली है और फिल्म में उनके अपने पिता के सामने हकला कर बोलने वाले संवाद उनकी भूमिका को नया विस्तार देते हैं. निखिल के लिए कुछ करने को जयादा नहीं था पर वे निराश नहीं करते और सौरभ दूबे याद रहते हैं. मुझे समझ नहीं आया कि भैरवी एक दृश्य में क्यों दिखाई दी लेकिन जॉयसेन अपनी भूमिका का सार तत्व बुने लेते हैं जबकि मोहन कपूर और इरावती हर्षे को कुछ और विस्तार दिया जा सकता था.

निर्देशन : दरअसल हेट स्टोरी का अर्थ है नफरत की कहानी और विक्रम भट्ट के साथ विवेक अग्निहोत्री ने बदले की इस कहानी में शरीरको हथियार बनाकर खुद को साबित करने और दूसरों को इस्तेमाल करने का रोचक तंत्र बुना है. यह फिल्म कई मायनों में हमारे यहाँ बनी उन पीड़ित नायिकाओं के बदले की कहानी से अलग है जो खलनायकों के खिलाफ आंदोलन शुरू करती हैं. यहाँ कहानी की नायिका खुद को बर्बाद कर उस से बदला लेने का रास्ता चुनती है. निर्देशक ने अपनी नायिका को नफरत के खिलाफ खुद को किसी भी तरह बदलने की छूट दी है और जिसके चलते फिल्म में हमें रंजिश और बदले के बीच ऐंद्रिकता में लिपटे कुछ ऐसे रिश्तों का सच भी दिखाई देता है जो हमें चौंका देते हैं.फिल्म में बेबाकी से लिए गए बोल्ड दृश्य हैं और निर्भीक संवाद भी. पर अंत में नैतिकता के दबाव में विक्रम और विवेक ने अपने विवेक का इस्तेमाल कर उसे मौत के आगोश में सुला दिया है ताकि सामाजिक तौर पर किसी बहस से बचा जा सके. हालांकि फिल्म की कहानी भी साधारण तरीके से रची गयी है और मध्यांतर के बाद उसकी गति सुस्त है.कुछ दृश्यों में बोले गए सम्वाद नाटकीयता भरे हैं और दृश्य भी बचकाने लगते हैं तो इसकी वजह है कि विवेक का ध्यान कहानी और पटकथा से हटकर सेक्स और उसके प्रदर्शन में उलझ गया है.फिर भी लाल और गहरे रंग में रची गयी अमर मोहिले के पाश्र्व संगीत, अतर सिंह के कैमरे में उतरी दिल्ली ,अब्बास अली मुग़ल के एक्शन और सत्यजीत गजमेर के सम्पादन वाली ये फिल्म एक बार देखी जा सकती है.

फिल्म क्यों देखें : पाउली दाम की बोल्डनेस के लिए.

फिल्म क्यों ना देखें : इसे व्यस्क प्रमाण पात्र मिला है.

रेटिंग - /

रामकिशोर पारचा

अब होगा धरना अन लिमिटिड

vin_100412_movieरेटिंग - ५/२

दो टूक : सच,सच होता है और एक दिन वो सामने आ ही जाता है पर ये भी सच है कि इस सच के सचों का सच जानने के लिए झूठ और उसके सच को जानना जरुरी है. निर्माता और निर्देशक दीपक तंवर की ओमकार दास मानिकपुरी, मिलिंद गुणाजी, सुनील पाल, एहसान कुरैशी, सौरभ मलिक और रेखा राणा के अभिनय वाली फिल्म अब होगा धरना अन लिमिटिड भी दुनिया समाज और राजनीति के कुछ ऐसे ही झूठों के सचों को दिखाने वाली है.

कहानी : फिल्म की कहानी अपने सत्ता में आने की बाट जोह रही विपक्ष में बैठी अवसरवादी पार्टी के नेता गोपीनाथ [ मिलिंद गुना जी] से जुडी है. गोपीनाथ की पार्टी के पास वोट बटोरने का कोई रास्ता नहीं है. ऐसे में मुख्यमंत्री बनने की लालसा में वो बाबा लक्ष्मण देव [सुनील पाल ] की मदद लेता है.  गोपीनाथ के हिसाब से लक्ष्मण सरकार को भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ आमरण अनशन का अल्टिमेटम देता है तो सत्ताधारी पार्टी सकते में आ जाती है . लेकिन हालात तब बदलते हैं जब बाबा गोपीनाथ के साथ करोड़ों की डील करता है और धरने के साथ शुरू हो जाती है पैसा कमाने और अपने स्वार्थ सिधह करने की दौड़ की शुरुआत. यही नहीं , इस धरने के बीच सच और झूठ की लड़ाई लड़ते हुए गरीब आदमी को उसका हक दिलाने की लड़ाई लड़ रहा सत्या शिवदास [ओमकार दास मानिकपुरी ] जब आ जाता है तो सबकुछ बदल जाता है. फिल्म में राहुल और प्रियंका बने सौरभ मलिक और रेखा राणा के पात्र और चरित्र भी शामिल हैं.

गीत संगीत : फिल्म में कोई पारम्परिक गीत नहीं है और करीब डेढ़ घंटे की फिल्म में किसी गीत की जरूरत भी नहीं थी फिर भी शंकर साहनी का तैयार किया बरखा बिष्ट पर एक आयटम गीत फिल्माया गया है जो याद भी नहीं रहता.

अभिनय : पोस्टर्स की बात करें तो पीपली लाइव से चर्चा में आये अभिनेता ओमकार दास मानिकपुरी केंद्र में हैं लेकिन सही मायनों में मिलिंद गुणाजी सुनील पाल के साथ एहसान कुरैशी के चरित्रों को शिल्प में बुना गया है.ओमकार दास मानिकपुरी अपने लुक और बोलचाल में कुछ नया नहीं करते और नायक और नायिका की तरह कहानी में शामिल सौरभ मलिक और रेखा राणा बस ठीक हैं.

निर्देशन : दीपक तंवर की फिल्म अब होगा धरना अनलिमिटेड में अन्ना और उनकी लोकप्रियता का सहारा लेकर अपनी बात कहने की कोशिश की गयी है. फिल्म में चिंतन है और आन्दोलन भी. लेकिन कमजोर पटकथा और उसके स्तरीय अंकन से वो प्रभाव नहीं छोड़ पाती. दीपक मध्यांतर के बाद फिल्म में उसके विस्तार को लेकर भी उलझ जाते हैं. संवाद बहुत जल्दी जल्दी बुने गए हैं और सम्पादन सुस्त है . इस पर कुछ और मेहनत की जाती तो इसे देखने लायक बनाया जा सकता था.

फिल्म क्यों देखें : अगर भ्रष्ट लोगों के सच देखना चाहते हैं.

फिल्म क्यों न देखें : विषय के हिसाब से कमजोर फिल्म है.

(रामकिशोर पारचा जाने-माने फिल्म समीक्षक है और काफी लम्बे समय से

जर्नलिस्ट टुडे से जुडे है।)

बिट्टू बॉस

Pulkit-Samrat-Bittoo-Boss-Movie-Stills1रेटिंग - ५/२.५ 

दो टूक : मामला रिश्तों का हो या पैसों का. आपके अन्दर का इंसान कभी नहीं बदलता. बस यही छोटा सा सन्देश देती है निर्देशक सुपवित्र बाबुल की पुलकित सम्राट, अमिता पाठक, राजेन्द्र सेठी और मोहन कपूर के अभिनय वाली फिल्म बिट्टू बॉस.

कहानी : फिल्म की कहानी पंजाब के आनंद पुर साहेब में रहने वाले बिट्टू [पुलकित सम्राट] की है. बिट्टू शादियों में ‍वीडियो शूटिंग करता है और लोगों के चेहरों पर खुशियों को कैमरे में कैद करना उसका पेशा है. लोग उसकी अहमियत तब तक ही मानते हैं जब तक वो कैमरा लेकर उनके सामने है. लोग उसे टुचा कैमरामैन कहते हैं. मस्त बिट्टू इसकी परवाह नहीं करता. पर एक शादी में मृणालिनी [अमिता पाठक] से उसकी मुलाक़ात सबकुछ बदल देती है. वो चाहती है बिट्टू कोई बड़ा काम करे . वो उसे लोकल टीवी स्टेशन ले जाती है पर जब उसे वहां से अपमानित कर निकाल दिया जाता है तो वो पैसा और नाम कमाने की जुगत में लग जाता है ताकि खुद को साबित कर सके. एक दिन उसका एडिटर वर्मा (राजिंदर सेठी) उसे एक ब्लू फिल्म के जरिये पैसा कमाने का आयडिया देता है. वह ब्लू फिल्म बनाने के लिए शिमला पहुंच जाता है और एक होटल में रूककर दूसरे कमरों में हिडन कैमरे भी लगा देता है ताकि कमरे में होने वाली गतिविधियों को रिकॉर्ड कर मार्केट में बेचे और खूब पैसा कमाए. पर उसका जमीर उसे इस बात की इजाजत नहीं देता. यहीं नहीं,अपने कैमरे में जब उसे एक कमरे में एक लड़की मुसबत में नजर आती है तो फिर उसकी उसे बचाने की मुहीम शुरू हो जाती है. बस एक इंसान के सच और उसके सामने आने की रोचक कहानी है बिट्टू बॉस .

गीत संगीत : फिल्म में कुमार के लिखे गीत और संगीत राजीव सच्चर का है. अब फिल्म चूँकि शादी ब्याह से जुडी कहानी के बीच सफर करती है तो इसका गीत संगीत भी वैसा ही गढ़ा गया है . खासतौर से बिट्टू सब की लेगा जैसे गीत. फिल्म का फ्लेवर पंजाबी है और उसका संगीत भी उसी छुअन के साथ रचा गया है . मिका फिल्म के गीतों में पूरी मस्ती और जोश में दीखते हैं इसलिए उनका कबूतर, श्रेया का कौन केन्दा, तुलसी कुमार का लठ्ठे  दी  चादर जैसे गीत सुने जा सकते हैं.

अभिनय : टीवी धारावाहिकों के बाद पुलकित सम्राट ने अपनी पहली ही फिल्म में आत्मविश्वास का परिचय दिया है. बिट्टू की भूमिका के लिए पुलकित सटीक चुनाव है. उनकी शारीरिक भाषा के हिसाब से भी और भाव-भंगिमाओं में शामिल लुक में भी. सपनों से भरे एक कस्बाई युवक की भूमिका उनपर फब गयी है. अमिता पाठक को मौका मिला है खुद को साबित करने का पर वे पुलकित के सामने बहुत जयादा जोर आज्मायश नहीं कर पाई है.विक्की ड्रायवर बने आशुतोष पाठक, टीवी एडिटर बने राजेंदर  सेठी  याद रहते हैं पर मोहन  कपूर  को कुछ और विस्तार दिया जा सकता था. हालांकि फिल्म में बहुत सारे छोटे छोटे पात्र और चरित्र हैं पर वे याद रहते हैं उनके नाम नहीं.

निर्देशन : गौर से देखा जाए तो यशराज चोपड़ा शैली की फिल्मों की तरह बनी बिट्टू बॉस के लिए निर्देशक के पास एक अच्छा विचार था. लेकिन मध्यांतर से पहले एक शानदार फिल्म का आभास देती यह फिल्म मध्यांतर के बाद गति धीमी के कारण बहुत जयादा रोचकता नहीं जगा पाती. उदंड किस्म के कस्बाई या गंवई सपनों से लदे युवकों पर हमारे यहाँ बेहतर फ़िल्में बनी हैं. बिट्टू बॉस भी इसी कड़ी में शामिल है और उनके लिए एक सन्देश की तरह सामने आती है. पर इसमें बैंड बाजा बारात और तनु वेड्स मनु की छायाएं बनी रहती हैं. फिर भी अगर इसमें नयी बात दिखती है तो इसकी वजह है कि ये कुछ भावनातमक पलों को अलग तेवर के साथ दिखाती है . यह अलग बात है कि शिमला की सुंदर लोकेशन पर बनी, गौतम मेहरा के संवाद, अभिषेक सेठ के सम्पादन और मनीष भट्ट के कैमरा वर्क वाली फिल्म कुछ और बेहतर बन सकती थी.

फिल्म क्यों देखें : अच्छी फिल्म है.

फिल्म क्यों ना देखें : अगर बैंड बाजा बरात जैसी फिल्म देख चुके हों.

(रामकिशोर पारचा जाने-माने फिल्म समीक्षक है और काफी लम्बे समय से

जर्नलिस्ट टुडे से जुडे है।)

फिल्म एजेंट विनोद आज रिलीज

avनई दिल्ली,सौरभ सक्सेना,अजितेश मिश्रा:सैफ अली खान और करीना कपूर की बहुचर्चित फिल्म एजेंट विनोद आज रिलीज हो गयी है। फिल्म की खास बात करीना का नए ज़माने का मुजरा और सैफ अली का पुंगी सॉंग है जो खाफी हिट है। फिल्म पूरी तरह जेम्स बाँड की फिल्मो पर आधारित है।फिल्म में सस्पेंस को बरकरार रखा गया है।फिल्म के डायलाँग बहुत अच्छे है।सैफ अली खान ने अच्छी एक्टिंग की है और करीना कपूर बिल्कुल नेचुरल लगी है। फिल्म कही कही समझ से परे होती है पर अच्छी एडिटिंग से फिल्म को मजबूती मिल जाती है । कुल मिला कर कहा जा सकता है कि श्री राम राघवन ने अच्छी कोशिश  की है ।